Praacheen kaal mein shiksha ka mukhy uddeshy kya tha? प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य क्या था?

प्राचीन काल में शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मनुष्य के जीवन का भौतिक तथा आध्यात्मिक उत्थान करना था। मनुष्य ज्ञान से ही नैतिक मूल्युक्त अपना कर आदर्श बहुमुखी व्यक्तित्व तथा धर्म प्रवण बनता था। सामाजिक उत्तरदायित्यों का निर्वाह ज्ञानवान व्यक्ति ही सफलतापूर्वक कर सकता है इस प्रकार शिक्षा के निम्न उद्देश्य हो सकते हैं -

Image credit : pexels.com

1. आध्यात्मिक उत्थान: 

आध्यात्मिक उत्थान से व्यक्ति का जीवन भक्ति प्रबंध तथा धर्म प्रवण होता है था इससे व्यक्ति में ईश्वरोपासना, दैनिक क्रिया धर्म संबंधी अनेक अनुपालन आदि भावनाओं का विकास होता है मनु के अनुसार सोच, पवित्रता, आचार, स्नानक्रिया, अग्निकार्य और संध्योंपासना ब्रह्मचारी का प्रमुख धर्म था।


यह सब कार्य मनुष्य तभी कर सकता था जब वह शिक्षित होता था। इस प्रकार विद्यार्थी के लिए आध्यात्मिक साधन को विशेष महत्व दिया जाता था। मनुष्य जीवन में तप,दान, आर्जब (सरलता), अहिंसा, सत्य वचन आदि का विशेष महत्व है और इन्हीं तत्वों से आध्यात्मिक प्रेरणा मिलती है। 
अतः प्राचीनकालीन शिक्षा का एक उद्देश्य शिक्षार्थी के मन में आध्यात्मिक भावना को जागृत करना एवं उसमें नियमपूर्वक पूर्ण की भावना का विकास करना था। 

2. चारित्रिक विकास : 

आध्यात्मिक उत्थान के लिए मनुष्य में चारित्रिक गुणों का होना अनिवार्य था। शिक्षा से मनुष्य के चरित्र का उत्थान होता था। इसके अंतर्गत व्यक्ति नैतिक क्रियाएं संपन्न करता हुआ सन्मार्ग का अनुसरण करता। मनुस्मृति में लिखा है कि केवल गायत्री मंत्र का ज्ञाता अपने संच्चरित्रता के कारण पूजनीय होता था।


शिक्षा से मनुष्य में सौहार्द, नैतिकता, सदाचरण आदि गुणों का विकास होता था। प्राचीन पवित्र ग वेदों का अध्ययन करने से मनुष्य में पवित्रता का संचरण होता था। उसमें व्रत, साधना, श्रम तथा तप करने की भावना बलवती होती थी और इन्हीं गुणों से उसके चरित्र का निर्माण होता है।

3. व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास : 

शिक्षा प्रणाली व्यक्तित्व के एकांगी विकास पर ध्यान नहीं देती। व्यक्तित्व का चतुर्मुखी विकास हो, शरीर, बुद्धि, मन आदि की समस्त शक्तियां ऊर्ध्वमुखी होकर विकासशील हो, यही शिक्षा का प्रयोजन था। 


व्यक्ति के व्यक्तित्व का सर्वांगीण विकास से व्यक्ति में आत्मसंयम, आत्मचिन्तन, आत्मविश्वास, आत्म-विश्लेषण, आत्मा-विवेक, न्यायिक प्रवृत्ति तथा आध्यात्मिक वृति का उदय होना संभव था। किसी भी कर्म को संपन्न करने में सहायक आत्मविश्वास को जगाने के लिए ही प्राचीनकाल में शिक्षा प्रारंभ करने से पूर्व उपनयन संस्कार किया जाता था। जिसमें अग्नि के समक्ष विद्यार्थी का आत्मविश्वास जगाया जाता था इस प्रकार शिक्षा से व्यक्ति का संपूर्ण तथा सर्वांगीण विकास होता था।

4. पवित्रता का विकास करना : 

प्राचीन कालीन शिक्षा का एक उद्देश्य यह भी था कि शिक्षा मनुष्य को पवित्र आचरण करने में सहायक होती है, न केवल कर्म से बल्कि वचन तथा मन एवं आत्मा से भी, क्योंकि पवित्रता से शुद्ध विचार जन्म लेते हैं। शिक्षा प्रारंभ करने से पूर्व संस्कार संपन्न किया जाता था उसमें बालक को पहले शुद्ध किया जाता था लेकिन जीवन के अन्य पहलुओं में भी शुद्धता एवं पवित्रता लाने के लिए नियंत्रण आवश्यक था और यह शिक्षा के द्वारा संभव था।

5. गायत्री मंत्र का महत्व : 

प्रत्येक शिक्षा- संबंधी कार्य को करने से पूर्व गायत्री मंत्र का उच्चारण महत्व रखता है क्योंकि गायत्री मंत्र को ज्ञान की कुंजी कहा जाता है। 


मनुस्मृति से पता चलता है कि ब्रह्मा जी ने प्रत्येक पद में अ, का और म निकालकर ओम शब्द को स्थापित किया। 
इसी प्रकार सावित्री मंत्र भी तीनों वेदों से निकलता हुआ है। अतः शिक्षा प्राप्ति से पूर्व गायत्री मंत्र तथा सावित्री मंत्र का नमन करना अत्यंत आवश्यक था।

6. उत्तरदायित्वों के प्रति सजगता का विकास : 

शिक्षा से ज्ञान की प्राप्ति होती थी और ज्ञान से व्यक्ति अपने सभी प्रकार के उत्तरदायित्वों को वहां करने में सक्षम होता था चाहे वह सामाजिक उत्तरदायित्व हो या धार्मिक उत्तरदायित्व या अन्य किसी क्षेत्र से संबंधित हो। इस प्रकार शिक्षा से व्यक्ति में उत्तरदायित्वों के प्रति सजगता का विकास होता था।

7. शारीरिक क्षमता का विकास :  

जिस प्रकार मनुष्य के उन्नत विकास के लिए आत्मा की शुद्धि जरूरी थी इस प्रकार आत्मा के इस बाह्य आवरण अर्थात शरीर की शारीरिक क्षमता में भी विकास लाना जरूरी था और यह शिक्षा द्वारा ही संभव था। शिक्षा के द्वारा ही व्यक्ति को प्राणायाम सिखाया जा सकता था।


इस प्रकार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक विचारों का सर्वांगीण विकास करना था इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्राचीन काल में अनेक शिक्षा केंद्र की स्थापना की गई जिसमें पृथक विषय, विद्वान गुरु तथा शिक्षा प्रणाली से शिक्षा प्रदान की जाती थी।